एक जूती ने बनवा दिया एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय !
निज़ाम को खोलना पड़ा अपने खज़ाने का मुंह !
"निजाम ने दान मांगने आए पंडित मदन मोहन मालवीय जी को नीचा दिखाने के लिए अपनी पुरानी जूती आगे कर दी ! लेकिन मालवीय जी ने उसी जूती से ऐसा दांव खेला कि निजाम को अपने ही खजाने का मुंह खोलना पड़ा। जानिए कैसे एक जूती ने बनवा दिया एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय !
यह बात उस समय की है जब पंडित मदन मोहन मालवीय जी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की स्थापना के लिए देश भर से चंदा इकट्ठा कर रहे थे। उनका सपना एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाने का था जहाँ भारतीय संस्कृति और आधुनिक शिक्षा दोनों का संगम हो।
इसी सिलसिले में मालवीय जी हैदराबाद के निजाम 'मीर उस्मान अली खान' के पास पहुँचे। निजाम उस दौर में दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों में से एक माना जाता था, लेकिन वह बेहद कंजूस और घमंडी भी था।
जब मालवीय जी ने निजाम के सामने विश्वविद्यालय के लिए दान का प्रस्ताव रखा, तो निजाम अहंकार में आ गया। उसने मालवीय जी का अपमान करने की नियत से अपनी पुरानी, घिसी हुई जूती उतारी और मालवीय जी की तरफ फेंकते हुए कहा:
"मेरे पास किसी हिंदू विश्वविद्यालय को देने के लिए पैसे नहीं हैं! अगर तुम्हें कुछ चाहिए, तो मेरी यह जूती उठाकर ले जाओ और इसे ही बेच लो!"
वहाँ मौजूद सभी दरबारियों को लगा कि मालवीय जी गुस्सा होंगे या अपमानित होकर चुपचाप लौट जाएंगे। लेकिन मालवीय जी के चेहरे पर न तो कोई गुस्सा आया और न ही कोई झिझक। वे मुस्कुराए, उन्होंने बड़ी श्रद्धा और सादगी से निजाम की जूती उठाई और बिना एक शब्द बोले दरबार से बाहर आ गए।
अगले ही दिन मालवीय जी हैदराबाद के सबसे बड़े बाजार के बीचों-बीच जा बैठे। उन्होंने निजाम की उस जूती को एक कपड़े पर सजाया और ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाने लगे:
"दुनिया के सबसे अमीर हैदराबाद के निजाम की शाही जूती नीलाम हो रही है! जो सबसे ज्यादा बोली लगाएगा, यह ऐतिहासिक जूती उसी की होगी!"
यह खबर आग की तरह पूरे हैदराबाद में फैल गई। निजाम के वफादार और अमीर लोग शाही जूती खरीदने के लिए बोलियाँ लगाने लगे। बोली हजारों रुपये से शुरू होकर लाखों तक पहुँचने लगी।
जब यह बात महल में निजाम तक पहुँची, तो उसके हाथ-पैर फूल गए! निजाम को समझ आ गया कि अगर उसकी पुरानी जूती किसी आम इंसान ने खरीद ली, तो पूरे विश्व में उसकी थू-थू होगी और उसकी इज्जत का कचरा हो जाएगा।
अपनी साख बचाने के लिए निजाम ने तुरंत अपने मंत्रियों को दौड़ाया और आदेश दिया कि "चाहे जितने भी पैसे लगे, वह जूती तुरंत वापस खरीदकर लाओ!"
निजाम के अधिकारियों को मजबूरी में मालवीय जी के पास जाकर उस जूती के बदले लाखों रुपये की भारी-भरकम राशि देनी पड़ी।
मालवीय जी ने मुस्कुराते हुए जूती लौटाई, वह सारा धन समेटा और उसी पैसे से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की नींव को और मजबूत किया। निजाम हाथ मलता रह गया और मालवीय जी ने सिद्ध कर दिया कि बुद्धि के आगे दुनिया की कोई भी दौलत या अहंकार टिक नहीं सकता।
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि इरादे नेक हों और बुद्धि तीव्र हो, तो इंसान अपमान को भी अपने महान लक्ष्य की सफलता में बदल सकता है। विपत्ति या अपमान से घबराने के बजाय अपनी सूझबूझ से काम लेना चाहिए।
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